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रविवार, 28 फ़रवरी 2016

खरा सोना

Khara Sona in Hindi

आज कल  एकल परिवार की ही प्रथा हर कही देखनें को मिल रही  है। कोई भी संयुक्त परिवार में  रहना नहीं चाहता। जब हम कभी  परेशानियों में होते है और हमें किसी की राय की जरूरत  महसूस होती  है तो हमें लगता है कि हमारे सिर पर बड़े बुजुर्गों का हाथ नहीं है। उनके जीवन के अनुभवों से हमारी जिंदगी कितनी आसान हो जाया  करती थी । एकल  परिवार के बच्चों में वो संस्कार ,सदस्यों से भावात्मक जुड़ाव कहाँ  देखने को मिलते है ? वो कहानियां, जो बच्चों के बौद्धिक विकास में सहायक होती थी, जिनके द्वारा वो ना जाने कितने ज्ञान बिना किताबों के हासिल  लेते थे, आज गायब सी हो गयी हैं ।  बच्चों के हाथ में आज केवल टी.वी का रिमोट होता है, जिससे  वो सिर्फ कार्टून देखते हैं या वीडियो गेम्स खेलते हैं। आइये, आज शहर में रहने वाले एकल परिवार की जिंदगी के बारे में जानते हैं। 

अलार्म की आवाज से सुधा की नींद टूटी उसने देखा सुबह के 8 :00 बज गएँ हैं, वह  घबरा कर कमरे से बाथरूम की तरफ भागी फिर उसने बच्चों को जगा कर तैयार किया।  सुधा ने अपने पति रवि को भी जगाया। तब तक काफी समय हो गया था। सुधा ने रवि से कहा ,"बच्चों को   रास्ते में कुछ खिला देना और तुम भी कुछ खा लेना। मैं कुछ बना नहीं सकी। मैं ऑफिस जा  रही हूँ। " फिर सभी अपनी-अपनी मंजिल पर निकल गए। 

शाम को जब सुधा घर आई , तो रवि का फोन आया। उसने बताया कि गाँव से कुछ दिनों के लिए माँ आ रही है, और उन्हें कल सुबह लेने जाना हैं। सुधा ने सोचा,"अब क्या होगा ? अब तो काम और भी बढ जायेगा।" सुबह होते ही रवि अपनी माँ पार्वती जी को स्टेशन से घर ले आया। सुधा ने जाहिर नहीं होने दिया कि वो अपनी सास के आने से खुश नहीं है। मगर बच्चों ने पार्वती जी में अपना सच्चा दोस्त ढूँढ लिया था। अब बच्चों को दिन भर की छोटी -छोटी बातें सुनने वाला कोई मिल गया था। अब वह कभी भी टीवी  के रिमोट को हाथ भी नहीं लगाते। बस दादी की कहानी और बातों से सारा आनंद पाकर बेहद खुश हो जाते। सुधा को भी बच्चों का व्यवहार बहुत बदला हुआ लग रहा था। जो बच्चे खाना खाने में आना-कानी करते थे ,अपनी बात को मनाने की हठ करते थे , देर रात तक टीवी देखते थे , अब वो कितने अनुशाषित हो गए थे, जैसे कोई चमत्कार हो गया हो। 

सुधा को अब बस किचन का काम संभालना पड़ता था। रवि और सुधा को भी अब एक दुसरे से बात करने का समय मिल जाता था। एक दिन सुधा ऑफिस से घर आई। उसने रवि को बताया की उसका प्रमोशन हो गया है और उसकी ऑफिस की सहेलियाँ उससे घर में पार्टी की फरमाइश कर रही हैं। तभी पार्वती जी ने कहा ,"क्या हुआ बहू ? बुला लो अपनी सहेलियों को। मैं हूँ न। " अगली सुबह रविवार का दिन था। पार्टी शाम को रखी गई। सुबह से ही सुधा और पार्वती जी किचन में व्यंजनों को बनाने में लग गई। सभी तैयारियां पूरी हो गईं। सुधा नहीं चाहती थी की उसकी मॉडर्न सहेलियां उसकी सासू माँ को लेकर कटाक्ष करें। इस लिए उसने रवि से कहकर बच्चों के कमरे में ही पार्वती जी को रहने को बोल दिया। 

शाम को पार्टी में सहेलियां आईं और खाना खाकर बहुत खुश हुईं।  एक सहेली ने सुधा से कहा ,"किस होटल से मँगवाया है ये खाना ? मुझे भी नंबर दे देना।" सुधा ने बताया ,"ये सारा खाना मैंने और मेरी सासू माँ ने मिलकर बनाया है। " सहेलियों ने उसकी सास से मिलना चाहा। सुधा ने संकोच करते हुए पार्वती जी को बुलाया। पार्वती जी के आते ही वे सहेलियों से ऐसे घुल-मिल कर बातें करने लगी जैसे वर्षों के बाद किसी पुरानी सहेली से मुलाकात हुई हो।  कुछ ने तो आचार , मिठाईयों तथा गाने भजन को भी नोट कर लिया। सभी ने पार्वती जी की बहुत तारीफ़ की और कहा ,"काश ! मेरी भी ऐसी सासू माँ होतीं। " सुधा बहुत खुश थी , जैसे उसने कोई मेडल ही जीत लिया हो। 

अब उसकी सोच अपने सास के प्रति काफी बदल गयी थी।  दिन कैसे निकलते जा रहे थे, पता नहीं चल रहा था। एक दिन रवि ने सुधा से ,"माँ की वापसी का टिकट कटवाने जाना है। " सुधा ने कहा ,"ठीक है। " मगर सुधा नहीं चाहती थी कि उसकी सास अभी गाँव वापस जाये। उसने कहा,"वहाँ माँ बीमार पड़ी तो उनका ख्याल कौन रखेगा ?" रवि ने कहा ,"वो यहाँ जीवन भर तो नहीं रह सकती न !" सुधा ने कहा ,"मैं भी यही कहना चाहती हूँ , क्योंकि अब मेरी सोच बदल गयी है। मैं उन्हें अब नहीं जाने दूँगी। वो मेरी सासू माँ नहीं मेरी माँ हैं। वो हमारे घर का चमकता सोना हैं - खरा सोना "

Image-Google

8 टिप्‍पणियां:

  1. Aaj kal sanyukt parivar kahan dekhne ko milta hai.sabhi nuclear family me hi rehna chahte hain.

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  2. aisa nhi hai ki duniya ki sari sasu ma ek jaisi hoti ho, par ha jo achchi hai unki tarif to honi hi chahiye. or jo kntain ho unhe is kahani se shikh leni chahiye.

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  3. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. ब्लॉग को पढ़ने के लिए धन्यवाद, रजनीश जी

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  5. कहते हैं की पेड़ चाहे जितना बूढ़ा हो जाए छांव तो देता ही है। पर आज की पीढ़ी को शायद यह सब बकवास लगता है।

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